न्यूनतम अंकों से पास की हाई स्कूल व हायर सेकेंडरी परीक्षा, हौसलों से चयनित हुए आरक्षक…
अमित शर्मा, लाड़कुई/भेरूंदा
भेरूंदा – शिक्षा के बदलते दौर में विद्यार्थी प्रतिशत की और दौड़ लगा रहे हैं। जब परीक्षा के परिणाम सामने आते हैं तो चर्चा इस बात की होती है कि कौन सा विद्यार्थी अब्बल आया है और किस विद्यार्थी ने कक्षा में सबसे कम अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण की है। कई बार कम अंक लाने वाले विद्यार्थी अपने आप में शर्मिंदगी महसूस करते हैं कि अन्य विद्यार्थियों के मुकाबले वह परिणाम लेकर नहीं आ सके। लेकिन अच्छे अंकों व न्यूनतम अंको से परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थियों के लिए आदिवासी अंचल में रहने वाले दो युवा मिशाल बनकर सामने आए हैं।
नगर क्षेत्र के ग्राम लाड़कुई अंतर्गत आने वाले आदिवासी गांव भिलाई में निवास करने वाले राकेश और दिलीप बारेला का चयन मध्य प्रदेश पुलिस आरक्षक के पद पर हुआ है। दोनों ही विद्यार्थियों की प्रारंभिक शिक्षा मात्र 2000 की आबादी वाले गांव भिलाई में ही हुई। माध्यमिक शिक्षा गांव में ग्रहण करने के बाद कक्षा नौवीं से लाड़कुई के पीएमश्री विद्यालय में पहुंचकर शिक्षा ग्रहण की। दोनों ही विद्यार्थियों की स्थिति पढ़ने में सामान्य थी। लेकिन मन में शिक्षा ग्रहण करने का जज्बा था। कक्षा नौवीं में प्रवेश लेने के बाद जब पहली बार कक्षा में प्रवेश किया तो मातृभाषा हिंदी को पढ़ने में ही दिक्कतों का सामना करना पड़ा।अपनी इस कमजोरी को दोनों ही आदिवासी छात्रों ने ढाल बनाकर शिक्षकों के मार्गदर्शन में अपनी पढ़ाई निरंतर जारी रखी। उनके जोश और जज्बे से अंकों के पीछे ना दौड़कर निरंतर पढ़ाई जारी रखते हुए दोनों ने कड़ा परिश्रम किया और इसका नतीजा यह हुआ कि 10 लाख की भीड़ में भी दोनों का चयन आरक्षक के पद पर हुआ।
इस मामले में पीएमश्री विद्यालय के प्राचार्य विजय नागर का मानना है कि सफलता पाने के लिए केवल अंक मायने नहीं रखते। कम अंकों में भी विद्यार्थी वह मुकाम हासिल कर सकते हैं जिसकी कल्पना उन्होंने नहीं की थी। केवल मन में एक निर्धारित लक्ष्य और उसको पूरा करने का जज्बा होना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी गुरुदक्षिणा नहीं हो सकती। जब उनके स्कूल में पड़ा विद्यार्थी अपनी मंजिल पर पहुंचकर उसे मुकाम को हासिल कर गया हो। उन्होंने विद्यार्थियों से यह भी कहा कि प्रत्येक विद्यार्थियों को सबक नहीं लेना है बल्कि प्रेरणा के रूप में इसे लेते हुए काम करना है। इस भर्ती परीक्षा में करीब 10 लाख युवाओं ने भाग लिया था। जिनमें से शारीरिक दक्षता और लिखित परीक्षा के कठिन चरणों के बाद मात्र 07 हजार के लगभग बच्चों का चयन हुआ। राकेश और दिलीप ने न्यूनतम अंकों से 10 वीं 12 वीं पास करने के बावजूद इसको पार कर यह साबित कर दिया कि मार्कशीट के नंबर आपका भविष्य तय नहीं करते, बल्कि आपकी एकाग्रता और मेहनत तय करती है।
