भैरूंदा – वन विकास निगम लाड़कुई में अतिक्रमण हटाए जाने की हालिया कार्रवाई ने ग्रामीणों में भारी रोष उत्पन्न कर दिया है। ग्रामीण खुले तौर पर वन विकास निगम पर ‘मुंह देखकर’ कार्यवाही करने और पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि कुछ लोगों के अतिक्रमणों को पूरी तरह से हटा दिया गया है, जबकि दूसरों को यह कहकर छोड़ दिया गया है कि उनका अतिक्रमण ‘पुराना’ है।

यह मामला वन विकास निगम लाड़कुई के वन क्षेत्र कक्ष क्रमांक 26 से जुड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण का दौर जारी है, जहां बेशकीमती सागौन के पेड़ों को काटकर धड़ल्ले से खेती की जा रही है। यह गौरतलब है कि यह वन क्षेत्र 2021 में वन परिक्षेत्र सामान्य द्वारा वन विकास निगम को हस्तांतरित किया गया था। तब से लगातार अतिक्रमण का सिलसिला चलता रहा और आज स्थिति यह है कि सैकड़ों एकड़ जमीन पर ग्रामीणों ने कब्जा कर खेती करना शुरू कर दिया है।

चयनित कार्यवाही ओर ग्रामीणों की नाराजगी –
हाल ही में जब वन विकास निगम अतिक्रमण हटाने के लिए मौके पर पहुंचा, तो उसने चुनिंदा स्थानों पर ही कार्रवाई की। इसी बात ने ग्रामीणों को सबसे ज्यादा नाराज किया है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि वन विकास निगम के कर्मचारी और अधिकारी ‘मुंह देखकर’ कार्रवाई कर रहे हैं। उनके अनुसार, कुछ लोगों के अस्थायी टप्पर (झोपड़ियां) पूरी तरह से ध्वस्त कर दिए गए, जबकि कुछ अन्य लोगों के टप्परों को यह कहकर छोड़ दिया गया कि वे ‘पुराने अतिक्रमण’ हैं। ग्रामीणों ने बताया कि इस क्षेत्र में 2018 के दौरान वन विभाग द्वारा बकायदा रसीदें भी दी गई थीं, जिन्हें उन्होंने वन विकास निगम के अधिकारियों को दिखाया भी था। ग्रामीणों की मांग है कि अगर अतिक्रमण हटाना ही है, तो एक सिरे से समान रूप से हटाया जाए, न कि किसी का हटाया जाए और किसी का नहीं।

मिलीभगत या लापरवाही पर सवाल –
ग्रामीणों ने वन विकास निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों पर मिलीभगत या घोर लापरवाही का भी गंभीर आरोप लगाया है। उनका तर्क है कि जब कक्ष क्रमांक 26 को 2021 में वन विकास निगम को हस्तांतरित किया जा चुका था, तो इतनी बड़ी तादाद में पेड़ों की कटाई और सैकड़ों फीट गहरे कुएं खोदने तक ये अधिकारी-कर्मचारी कहां थे? ग्रामीणों का कहना है कि सैकड़ों पेड़ काटकर खेती योग्य भूमि बनाना और कई फीट गहरे कुएं खोदना एक या दो दिन का काम नहीं है। इससे साफ तौर पर पता चलता है कि या तो वन विकास निगम के अधिकारियों-कर्मचारियों की अतिक्रमणकारियों से मिलीभगत है, या फिर उन्होंने समय-समय पर क्षेत्र का दौरा न करके लापरवाही बरती है, जिसके कारण इतनी बड़ी तादाद में पेड़ों को काटकर ग्रामीणों द्वारा कब्जा कर लिया गया।

‘पहले कब्जा दिया, रसीद काटी, अब बेदखल कर रहे’ –
ग्राम सिंहपुर के ग्रामीण अनार सिंह सूर्यवंशी ने इस पूरी कार्रवाई को ‘नाइंसाफी’ करार दिया है। उन्होंने बताया कि पहले इन आदिवासी लोगों द्वारा कब्जा किया गया था और जिसकी विभाग द्वारा बाकायदा रसीदें भी काटी गई थीं। इसके बाद से यही ग्रामीण इस भूमि पर खेती कर रहे हैं। परंतु, अब वन विकास निगम उन्हें बेदखल करने की कार्रवाई कर रहा है। सूर्यवंशी का कहना है कि यह एक हिसाब से नाइंसाफी है, क्योंकि विभाग एकतरफा कार्रवाई कर रहा है और यह पक्षपातपूर्ण कार्रवाई नजर आ रही है, जिससे यह लगता है कि ‘कहीं न कहीं दाल में कुछ काला है’।
अनार सिंह सूर्यवंशी
‘बरसों से हमारा कब्जा, बिना सूचना दिए तोड़ी टप्पड़ियाँ’ –
ग्रामीण शैतान और विमलेश कुमार ने भी अपनी व्यथा सुनाई। उन्होंने बताया कि उनका बरसों से सिंहपुर के वन विकास निगम की भूमि पर कब्जा है। उन्होंने विभाग द्वारा रसीदें भी कटाई थीं, परंतु बिना किसी पूर्व सूचना दिए और उनकी एक भी बात सुने बिना उनका कब्जा हटा दिया गया। उन्होंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अब उनके सिर पर बारिश की मार है और उनके पास रहने की कोई जगह नहीं है, क्योंकि उनके खेत में बनी टप्पड़ियाँ भी तोड़ दी गई हैं। उन्होंने भी यही आरोप दोहराया कि विभाग नियमानुसार कार्रवाई नहीं कर रहा है और सिर्फ ‘चेहरा देखकर’ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा रही है।
शैतान सिंह
विमलेश कुमार
वही जब इस कार्यवाही को लेकर वन विकास निगम के अधिकारी से जानकारी लेनी चाही, तो विभाग के अधिकारी वह से चलते बने।
