अमित शर्मा, लाड़कुई/भैरूंदा
भैरुंदा – सिविल अस्पताल भैरुंदा एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में है। सोमवार को हुए नसबंदी ऑपरेशन के दौरान सिविल अस्पताल में पदस्थ महिला डॉक्टर की लापरवाही के कारण एक आदिवासी महिला की मौत का मामला सामने आया है। घटना से आक्रोशित परिजनों ने गुरुवार देर शाम को अस्पताल परिसर में शव रखकर जमकर हंगामा किया और डॉक्टर के खिलाफ सख्त कार्यवाही की मांग की। स्थिति बिगड़ती देख पूरे अस्पताल परिसर को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया।

वही ग्राम सिंहपुर निवासी मृतक महिला के पति नवल सिंह बारेला ने बताया कि उसने अपनी पत्नी शिवानी को 12 जनवरी को सुबह नसबंदी ऑपरेशन के लिए सिविल अस्पताल भैरुंदा में भर्ती किया गया था। दोपहर करीब 03 बजे डॉ. रुकमणी गुलहारिया द्वारा ऑपरेशन किया गया। परिजनों का आरोप है कि उसी रात 10 बजे अस्पताल प्रबंधन ने यह कहकर उन्हें घर भेज दिया कि बाकी सभी मरीज जा चुके हैं।
घर पहुँचते ही आधी रात को शिवानी की तबीयत अचानक बिगड़ गई और उसे रक्तस्राव (ब्लीडिंग) शुरू हो गई। अगले दिन 13 जनवरी को परिजन उसे पुनः भैरुंदा अस्पताल लाए जहाँ से उसे तत्काल सीहोर रेफर कर दिया गया। सीहोर में भी हालत में सुधार न होने पर 14 जनवरी को उसे भोपाल के नर्मदा अस्पताल और फिर हमीदिया अस्पताल ले जाया गया। हमीदिया के डॉक्टरों ने जाँच के बाद बताया कि ऑपरेशन के दौरान पेट के अंदर की नस/आंत कट गई है। जिससे शरीर में जहर फैल चुका है। इलाज के दौरान महिला ने दम तोड़ दिया।
परिजनों के आरोप- गलत नस काटने से हुई मौत –

मृतिका के परिजनों ने अस्पताल में हंगामा करते हुए सीधे तौर पर डॉ. रुकमणी गुलहारिया पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि डॉक्टर की एक गलती ने उनके परिवार की खुशियां उजाड़ गई। परिजनों ने इस मामले में दोषी महिला डॉक्टर के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर करने, पीड़ित परिवार को उचित और सम्मानजनक मुआवजा दिया जाने की मांग की हैं। मृतक महिला के पति ने आरोप लगाया कि महिला डॉक्टर के द्वारा इलाज के दौरान गलत नस काट दी गई, इससे उसकी पत्नी की मौत हुई है।
अस्पताल बना पुलिस छावनी, प्रशासन ने दिया आश्वासन –

आक्रोशित आदिवासियों ने करीब एक घंटे से अधिक समय तक अस्पताल का घेराव किया और डॉक्टर के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाए। भीड़ और बढ़ते तनाव को देखते हुए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। मौके पर पहुँचे एसडीएम ने आक्रोशित परिजनों को समझाते हुए कहा कि नियम अनुसार 02 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। हालांकि ग्रामीण और परिजन डॉक्टर पर आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग पर अड़े रहे। प्रशासन द्वारा घोषित 02 लाख रुपये की राशि को परिजनों ने नाकाफी बताया है।
जाँच के घेरे में डॉक्टर मैडम –
परिजनों का सीधा आरोप है कि डॉ. रुकमणी की लापरवाही और अस्पताल प्रबंधन द्वारा बिना ऑब्जर्वेशन के रात में छुट्टी देने के कारण शिवानी की जान गई। हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों की मौखिक टिप्पणी ने परिजनों के इस आरोप को और पुख्ता कर दिया है कि ऑपरेशन के दौरान आंतरिक अंग क्षतिग्रस्त हुए थे। इसके अतिरिक्त अस्पताल प्रबंधन पर इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि ऑपरेशन के मात्र कुछ घंटों बाद ही गंभीर मरीज को अस्पताल से घर क्यों भेज दिया गया? क्या ऑपरेशन थिएटर में सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था? 02 लाख की राशि क्या एक मासूम की जान की कीमत है, या केवल मामले को दबाने की कोशिश? हालांकि इस मामले में प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट रूख सामने नहीं आया है।
क्या कहते हैं आधिकारी –
एसडीएम सुधीर कुमार कुशवाहा ने इस मामले में बताया कि देर शाम को महिला की मौत के बाद परिजनों के द्वारा सिविल अस्पताल का घेराव किया था। इस दौरान अस्पताल परिसर में महिला का शव रखकर महिला डॉक्टर के निलंबन एवं पर्याप्त मुआवजा दिए जाने की मांग की गई थी। इस पूरे घटनाक्रम से कलेक्टर को अवगत कराया गया है।
विपक्ष ने उठाए सवाल – क्या आदिवासी की जान की कीमत सिर्फ 02 लाख ?
देश के कृषि मंत्री और 18 वर्षों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कद्दावर नेता की गृह विधानसभा में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की कलई खुल गई है। भैरुंदा के सिविल अस्पताल में नसबंदी ऑपरेशन के दौरान हुई लापरवाही ने आदिवासी महिला की जान ले ली। अब इस मुद्दे पर विपक्ष ने प्रशासन पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार लालच देकर अपनी नाकामियों को दबाना चाहती है। यूथ कांग्रेस प्रदेश महासचिव संजय पटेल हवेली ने इस मामले में आरोप लगाते हुए कहा कि जान की कीमत लगाना सबसे ज्यादा शर्मनाक है। उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व देश के दिग्गज नेता करते रहे हों, वहाँ के सिविल अस्पताल में ऐसी जानलेवा लापरवाही होना व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। विपक्ष ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने मृतिका के परिजनों को 02 लाख की आर्थिक सहायता का लालच देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की हैं। ऐसा लगता है कि एक गरीब आदिवासी महिला की जान की कीमत प्रशासन ने 02 लाख तय कर दी है, इससे बड़ी शर्म की बात और…
