चकल्दी व लाड़कुई मे बर्बादी की कगार पर वन विकास निगम के जंगल, वन विभाग कार्यवाही तो करता लेकिन नहीं पकड़े जाते वन माफिया..
रक्षक ही बने भक्षक, 50-50 मे चल रहा फर्नीचर मार्ट- सूत्र
– अमित शर्मा, लाड़कुई/भेरूंदा
बुधनी विधानसभा में इन दिनों अवैध इमारती लकड़ी के परिवहन को लेकर लगातार जहां कार्यवाही सामने आ रही है, तो वही कई खुलासे भी होते जा रहा है। सूत्रों की माने तो यहां रक्षक की भक्षक बने हुए हैं क्षेत्र के कहीं नातेदार डिप्टी मिली भगत कर या तो फर्नीचर मार्ट तक इमरती सागौन पहुंच रहे है, या 50-50 में काम कर रहे हैं। जिसका नया खुलासा रेहटी रेंजर के अंतर्गत आने वाली चकल्दी मे संचालित फर्नीचर मार्ट से सामने आया है। यहाॅ ग्रामीणों का कहना है कि नाकेदार एक अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर पार्टनरशिप में फर्नीचर मार्ट संचालित कर रहा है। वही वन विकास निगम एवं वन क्षेत्र से इमारती लकड़ियों के परिवहन का धरडले से काम किया जा रहा है।
वहीं सूत्रों का कहना है, चकल्दी के साथ नसरुल्लागंज व रेहटी में भी नाकेदार के सहयोग से लड़कियां पहुंचाई जा रही है, जिसके ऐवज मे मोटी रकम भी वसूली जाती। वही इन्ही की मेहरबानी से चकल्दी मे एक फर्नीचर मार्ट भी संचालित हो रहा है, जिसमे 50-50 की पार्टनरशिप बताई जा रही है, कुछ समय से मामला गरमाने के बाद अब हिस्सेदारो मे वृद्धि की बाते सामने आ रही है। देखा जाए तो मामला खुल्लम-खुल्ला होने के बाद भी कोई कार्यवाही नही होना कई सवालो को जन्म देता है।
नाम ना बताने कि शर्त पर ग्रामीण ने बताया कि वन विकास निगम क्षेत्र के लोह पठार के जंगलों से रात के अंधेरे में बेशकीमती सागौन का परिवहन किया जाता है। जो महादेव बेदरा, चतरकोटा होते हुए पहुंचाई जाती है, इसमे भिलाई, मोगराखेड़ा, सिराली, सिंहपुर, भैसान व बनियागांव क्षेत्र भी सामिल है। जहा से क्षेत्र मे इमारती लकड़ी का परिवहन बदस्तूर जारी है। क्योकि वन परिक्षेत्र लाड़कुई वन अमले की माने तो अधिकांश इन्ही क्षेत्रो से वाहन आते या क्षेत्र मे वाहनो की जप्ती की गई है, जिससे साफ होता है कि अवैध कटाई बदस्तूर जारी होने के साथ ही अतिक्रमण का सिलसिला भी जारी है।
बता दे कि लगभग 15 वर्ष पूर्व वन विकास निगम का गठन होने के बाद उपवन परिक्षेत्र चकल्दी के अंतर्गत आने वाली चतरकोटा, कोठरा, आमझिरी बीट वन विकास निगम में चली गयी थी। वन विभाग और वन विकास निगम तो अलग-अलग विभाग होने के कारण लकड़ी चोरों के हौसले और अधिक बुलंद हो गए। दोनों ही विभागों के कर्मचारी अलग होने से वह केवल अपनी बीट पर ही ध्यान देने लगे। जिसका नतीजा यह हुआ कि यहां पर जंगल नहीं बल्कि अब खाली मैदान दिखाई दे रहा है। सूत्र यह भी बताते हैं कि वन विकास निगम की बीट में कार्यरत नाकेदार जो इसी क्षेत्र में निवास करता है उसकी मिली भगत से भी इनकार नहीं किया जा सकता। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह भी है इनमें से कई नाकेदार को आष्टा- इच्छावर क्षेत्र मे भी प्लान्टेशन की जिम्मेदारी दी गई है, जिसका फ़ायदा वन माफिया उठा रहे है।
इस समय वनों की अवैध कटाई का मुद्दा जोरो पर है। जिस तरह से वन माफिया हरे भरे जंगलों को साफ कर खेती में तब्दील करते जा रहे हैं। उससे पर्यावरण अभियान को झटका लग रहा है। एक तरफ तो सरकार ने पर्यावरण संरक्षण सहित पुराने जल स्रोतों को रिचार्ज करने के लिए अभियान चलाया है। दूसरी ओर अवैध वन कटाई ने सरकार के अभियान पर पलीता लगा दिया है।
वनों की कटाई मामले में दोषी कौन है-
इस बात का पता लगाना भी मुश्किल है। क्षेत्र में वन विभाग और वन विकास निगम दोनों ही कार्यरत है। वनों की कटाई का सिलसिला क्षेत्र में बदस्तूर जारी है। लेकिन दोनों ही विभाग कटाई को लेकर यह कहते हुए देखे जाते हैं कि हमारे परिक्षेत्र में अवैध कटाई नहीं होती। जबकि वन विभाग के द्वारा प्रतिदिन अवैध लड़कियों का परिवहन करने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने का सिलसिला जारी है। ऐसे में इस बात में कोई संदेह नहीं की वनों की कटाई तो कम होने की वजाय लगातार बड़ी है। यह तो स्पष्ट है कि बीते 15 से 20 वर्षों में वनों की कटाई, जंगल परिक्षेत्र के रकबे मे कमी, खेती के रकबे में वृद्धि जैसे हालात निर्मित हुए हैं। इन वर्षों में वनों का विनाश रोकने के प्रयास नहीं हुए, जिसका नतीजा यह है कि साल दर साल तापमान में वृद्धि देखने को मिल रही है।
अवैध परिवहन के लिए अति संवेदनशील क्षेत्र-
चकल्दी वन परिक्षेत्र पूर्व से ही इमारती लकड़ियों के अवैध परिवहन के लिए अति संवेदनशील क्षेत्र है, उसके बावजूद भी यहां पर स्टाफ का अभाव बना हुआ है। यहां वर्तमान में केवल तीन स्टाफ मौजूद है, जिम दो डिप्टी रेंजर बनिया गांव एवं चकल्दी बीट में एक नाकेदार मौजूद है। बरसों से यहां चौकीदार की पद स्थापना भी नहीं हुई। नतीजा यह है कि वन माफिया अन्य बीट के कर्मचारियों से मिली भगत कर आसानी के साथ वनों का दोहन कर रहे हैं। वही जानकारी के अनुसार चकल्दी बीट मे 150 हेक्टेयर का एक कम्पार्टमेंट है, शेष जंगल वन विकास निगम के अंतर्गत आता है। जिसमे एक नाकेदार पदस्थ है, चौकीदार की नियुक्ति नही होने व संसाधनो की कमी के चलते गश्ती के दौरान कई परेशानी आती है, जिसको लेकर भी वरिष्ठ अधिकारियो को अवगत कराया गया है
सोशल मीडिया का उपयोग, ग्रुप पर देते हैं एक दूसरे को जानकारी-
विज्ञान के इस युग में सोशल मीडिया का उपयोग वन माफिया करने में भी नहीं चूक रहे। माफियाओ के द्वारा सोशल मीडिया पर अपना एक ग्रुप तैयार कर रखा है। इस दौरान वन विभाग की जो भी कार्यवाही होती है या होने वाली रहती है उसकी जानकारी ग्रुप के माध्यम से पहले ही पहुंच जाती है। जिससे वन माफिया सतर्क हो जाते हैं और कार्यवाही से पहले ही मौके से गायब हो जाते हैं। सूत्र का कहना है कि माफियाओ को इसकी जानकारी वकायदा विभाग के कर्मचारी ही उपलब्ध कराते हैं।
जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने वालों पर मेहरबानी क्यों-
वनों की विनाश का मुद्दा इस समय महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में वनों का संरक्षण करने वाले जिन जिम्मेदारों के द्वारा आंखों पर पट्टी बांधकर मुंह मोड़ लिया जाता है उन पर विभाग मेहरबानी क्यों करता है। वन विकास निगम के वन क्षेत्र मे लगातार वनो की कटाई व अवैध रूप से वन भूमि पर कब्जे के कई मामले देखे जा रहे है। इसके बावजूद भी कार्यवाही को लेकर सिर्फ दिखावा ही नजर आ रहा है।
