विभागों को ही नही पता, कहा से कहा तक है हमारी भूमि…
– अमित शर्मा, लाड़कुई/भेरूंदा
वनों की अवैध कटाई, वनों की जमीन पर होते अतिक्रमण, पर्यावरण के संरक्षण को लेकर हमारी मुहिम लगातार जारी है। जागरण की मुहिम का असर है कि जिस बेदर्दी से वन माफियाओं के द्वारा हरे-भरे पेड़ों को काटकर उनकी बलि दी जा रही थी, उस मामले में कमी देखने को मिली है। वन विभाग व वन विकास निगम के अधिकारी इस मामले में सक्रिय हुए और वनों की अवैध कटाई के रोकने के लिए जांच दलों का गठन कर अतिक्रमण कारियों को जमीनों से हटने की चेतावनी भी दी। हालांकि अभी भी हजारों हैक्टेयर भूमि अतिक्रमण कारियों ने अपने कब्जे में ले रखी है। जिन पर वन व वन विकास निगम का अधिपत्य होना बाकी है। वनों के संरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू निकलकर सामने आया, जिसमें वर्षो से वन भूमियों का सीमांकन नही होने की बातें सामने आई है। सीमांकन नही होने का नतीजा यह है कि कई बार राजस्व व वन विभाग अपनी-अपनी जमीन को लेकर अधिपत्य जताते है। लेकिन बीच में अतिक्रमण कारी इन जमीनों पर कब्जा जमाकर वर्षो से खेती करते चले आ रहे है। स्थिति यह है कि पिछले कुछ वर्षो में सरकार के आदेश पर राजस्व विभाग ने वन वासियों को पट्टों का वितरण किया है। राजस्व विभाग का मानना है कि यह जमीन उनकी है वहीं वन विभाग उस पर अपना अधिपत्य जताता है। यह मामले पिछले कई वर्षो से लगातार सामने आ रहे है। लेकिन दोनों ही विभाग इस मामले का निराकरण नही कर सके है। विभागों की आपसी उलझन का नतीजा यह है कि राजस्व व वन विभाग की कई भूमियों पर अतिक्रमण कारियों ने अपना कब्जा जमा रखा है। ऐसे में अतिक्रमण कारी जमे है और विभागीय स्तर पर कोई भी हलचल देखने को नही मिल रही।
उल्लेखनीय है कि जमीनों के सीमांकन के बाद ही यह स्पष्ट हो पाता है कि कौन सी जमीन किस विभाग के पास है। जब तक सीमांकन नही होगा, तब तक केवल मौखिक रूप से ही अधिपत्य की बातें कही जाती है। कुछ ऐसी ही स्थिति वन विभाग में देखने को मिल रही है। सही मायने में देखा जाए तो वन विभाग को ही नही पता कि उसकी जमीन की सीमा कहा तक है। वह तो केवल आंकड़ों के हिसाब से यह जानते है कि उनके अधिपत्य में इतने हैक्टेयर भूमि है। लेकिन हकीकत में सीमा को लेकर आज भी गफलत की स्थिति बनी हुई है।
जानकारी के मुताबिक राजस्व व वन विभाग का स्केल एक नही होने के कारण नक्शा अलग-अलग हिसाब से बनता है और जमीनों का सीमांकन विभागों को ही मिलकर करना होता है। क्षेत्र में कुछ ऐसे मामले भी है जहां दोनों ही विभागों के बीच जमीन पर अतिक्रमण होने की स्थिति सामने है। इसके लिए दोनों ही विभागों को अपने अभिलेखों का अपडेट करना आवश्यक है। जानकारी के अनुसार कलेक्ट्रेड कार्यालय में वन व्यवस्थापन को लेकर एक बैठक का आयोजन किया गया है जिसमें वन भूमि से संबंधित कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा भी होना है।
रेहटी क्षेत्र में वन भूमि को खेती में तब्दील करने का सिलसिला जारी…
रेहटी क्षेत्र में वन भूमि पर अतिक्रमण कर खेती योग्य बनाने का सिलसिला जारी है। विभाग आंख मूंदकर बैठा हुआ है, सरेआम बाइक एवं चार पहिया वाहन से सागौन की सिल्लियों का परिवहन किया जा रहा है। लेकिन विभाग का इस और भी कोई ध्यान नहीं है, दिखावे के लिए छोटी-मोटी करवाई कर दी जाती है। जहॉ एक और वनों का विनाश हो रहा है तो वहीं दूसरी और रेहटी- क्षेत्र में चल रहे मार्टो में भी अवैध रूप से लड़कियों का परिवहन किया जा रहा है। फर्नीचर मार्टो का लाइसेंस किस हिसाब से वितरित किया गया, यही समझ से परे है। एक और जहां सरकार वृक्षारोपण एवं पर्यावरण बचाने के लिए तरह-तरह के प्रयास कर रही है। तो वन परिक्षेत्र में लगातार जंगलों की कटाई चल रही है। दिन के उजाले के साथ-साथ रात में भी लड़कियों का परिवहन माफिया द्वारा किया जा रहा है जो आम जनता को तो दिख रहा है लेकिन रेहटी वन परिक्षेत्र के अधिकारी और कर्मचारियों को नहीं दिखाई दे रहा है। जांच के नाम पर दिखावा किया जा रहा है और वन भूमि धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
